रूसी और ईरानी तेल पर अमेरिकी छूट खत्म, भारत पर पड़ेगा गंभीर असर!

रूसी और ईरानी तेल पर अमेरिकी छूट खत्म, भारत पर पड़ेगा गंभीर असर!

Exemption From Sanctions

Exemption From Sanctions

वॉशिंगटन: Exemption From Sanctions: अमेरिका ने बुधवार को रूसी या ईरानी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों से और छूट देने की संभावना को खारिज कर दिया. अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह घोषणा की.

बेसेंट ने यहाँ पत्रकारों से कहा, 'हम रूसी तेल के लिए जनरल लाइसेंस को रिन्यू नहीं करेंगे और हम ईरानी तेल के लिए भी जनरल लाइसेंस को रिन्यू नहीं करेंगे. यह वह तेल था जो 11 मार्च से पहले पानी में था, इसलिए वह सारा तेल इस्तेमाल हो चुका है.'

5 मार्च को अमेरिका ने भारत को 30 दिनों के लिए प्रतिबंधों से छूट दी. इससे उसे यूक्रेन युद्ध के कारण लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिल गई. कुछ दिनों बाद अमेरिका ने इस छूट को कुछ अन्य देशों के लिए भी बढ़ा दिया. प्रतिबंधों से मिली यह छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई.

मार्च में रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद तीन गुना से भी ज़्यादा बढ़कर 5.3 अरब यूरो हो गई, क्योंकि तेल की मात्रा दोगुनी हो गई थी और तेल की कीमतों में उछाल के कारण आयात बिल बढ़ गया था. यूरोपीय थिंक टैंक 'सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर' (CREA) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि फरवरी में खरीद में गिरावट के बाद मार्च में भारत ने फिर से बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू कर दी.

रिपोर्ट में कहा गया, 'मार्च 2026 में भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार था, जिसने कुल 5.8 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन आयात किए. भारत की कुल खरीद में कच्चे तेल से बने उत्पादों का हिस्सा 91 प्रतिशत था, जिसकी कुल कीमत 5.3 अरब यूरो थी.'

कोयला (337 मिलियन यूरो) और तेल उत्पाद (178.5 मिलियन यूरो) उनके मासिक आयात का बाकी हिस्सा थे. फरवरी में भारत तीसरा सबसे बड़ा आयातक था, जिसने 1.8 बिलियन यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन खरीदे. प्रतिबंधों में छूट देने के बाद ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने कहा कि अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीदने को कहा, ताकि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच आपूर्ति की कमी और कीमतों में उछाल के डर को कम किया जा सके.

उन्होंने कहा कि यह कदम बाजार को स्थिर करने का एक अल्पकालिक, व्यावहारिक प्रयास था और इससे रूस के प्रति वाशिंगटन की नीति में किसी बदलाव का संकेत नहीं मिलता.